भारत के वो पांच अद्भुत मंदिर जहाँ हर कोई जाना चाहेगा
१. बृहदेशेश्वर मंदिर

बृहदेशेश्वर मंदिर (स्थानीय रूप से "बिग मंदिर" के रूप में जाना जाता है) भारत के तमिलनाडु राज्य में तंजावुर स्थित भगवान शिव को समर्पित एक हिंदू मंदिर है । यह भारत के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है और चोल अवधि के दौरान तमिल वास्तुकला का एक उदाहरण है । पूरे मंदिर का ढांचा ग्रैनाइट से बना है , जिसका निकटतम स्रोत मंदिर के पश्चिम में लगभग 60 किमी दूर है। मंदिर के आर्किटेक्ट और इंजीनियर कुंजरा मल्लान राजा राजा राम पेरुन्थाचन थे, जैसा कि मंदिर में मिले शिलालेखों में बताया गया था। यह मंदिर भारतीय वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है ।
२. कैलास मंदिर

कैलास (मंदिर) संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु जिसे मालखेड स्थित राष्ट्रकूट वंश के नरेश कृष्ण (प्रथम) (760-753 ई0) ने निमित्त कराया था। यह एलोरा (जिला औरंगाबाद) स्थित लयण-श्रृंखला में है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर भीतर बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में नन्दी है और उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी तथा स्तंभ बने हैं। यह कृति भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है।
३. चेन्नाकेश्वर मंदिर
चेन्नाकेश्वर मंदिर , जिसे केशव , केसावा या बेलूर का विजयनारायण मंदिर भी कहा जाता है, कर्नाटक राज्य के हसन जिले में 12 वीं शताब्दी का एक हिंदू मंदिर है। इस मंदिर को बनाने में तिन पीढ़िय लग गई और इसे खत्म करने में 103 साल लगे थे। युद्धों के दौरान इसे बार-बार क्षतिग्रस्त किया गया और लुटा गया। यह हसन शहर से 35 किमी और बेंगलुरु से लगभग 200 किमी दूर है। चेन्नाकेश्वर मंदिर 12 वीं शताब्दी के दक्षिण भारत के कलात्मक, सांस्कृतिक, धार्मिक परिप्रेक्ष्य और होसला साम्राज्य शासन का एक प्रमाण है। यह मंदिर हिन्दू धर्म के साथ साथ जैन धर्म में भी महत्व रखता है।
४. चोपता तुङ्गनाथ

तुंगनाथ उत्तराखण्ड के गढ़वाल के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित एक पर्वत है। तुंगनाथ पर्वत पर स्थित है तुंगनाथ मंदिर, जो ३,६८० मीटर की ऊँचाई पर बना हुआ है और पंच केदारों में सबसे ऊँचाई पर स्थित है। यह मंदिर १,००० वर्ष पुराना माना जाता है और यहाँ भगवान शिव की पंच केदारों में से एक के रूप में पूजा होती है। ऐसा माना जाता है की इस मंदिर का निर्माण पाण्डवों द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया गया था, जो कुरुक्षेत्र में हुए नरसंहार के कारण पाण्डवों से रुष्ट थे। तुंगनाथ की चोटी तीन धाराओं का स्रोत है, जिनसे अक्षकामिनी नदी बनती है। मंदिर चोपता से ३ किलोमीटर दूर स्थित है। बारह से चौदह हजार फुट की ऊंचाई पर बसा ये क्षेत्र गढ़वाल हिमालय के सबसे सुंदर स्थानों में से एक है। जनवरी-फरवरी के महीनों में आमतौर पर बर्फ की चादर ओढ़े इस स्थान की सुंदरता जुलाई-अगस्त के महीनों में देखते ही बनती है। इन महीनों में यहां मीलों तक फैले मखमली घास के मैदान और उनमें खिले फूलों की सुंदरता देखने योग्य होती है। प्राकृतिक सुन्दरता के बिच बना यह मंदिर स्वर्ग की अनुभूति कराता है।
५. आदि कुंबेश्वर मंदिर
आदि कुंबेश्वर मंदिर, कुंबकोणम देवता शिव को समर्पित एक हिंदू मंदिर है , जो तमिलनाडु के कुम्भकोणम शहर में स्थित है। शिव की पूजा आदी कुंबेश्वर के रूप में की जाती है, और इसे लिंगम द्वारा प्रस्तुत किया जाता है । उनकी पत्नी पार्वती को मंगलबाई अम्मान के रूप में चित्रित किया गया है। ऐसा माना जाता है कि कुंबकोणम शहर के नाम कुंबेश्वर मंदिर से जुड़ी किंवदंतियों से लिया गया है। कुंबकोणम को कुदामुकु के तमिल नाम से पहले भी जाना जाता था।
~सोनू कुमार सिंह

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